राजनीति से भी नही बच पाती मूर्तियाँ, क्या महत्व है भारतीय राजनीति में मूर्ति प्रेम, ब्राम्हण प्रेम।।

ग्लोबल भारत न्यूज़ नेटवर्क

भारतीय राजनीति:- भारतीय राजनीति में सबसे अलग तरह की राजनीति है यहाँ पर शतरंज के खेल की तरह सभी मोहरों की अपनी अपनी अलग चाल है, जिस तरह शतरंज का वजीर की अपनी विपक्षियों को रौंदते हुए चलता है उसी तरह यहाँ की राजनीति में वजीर की चाल अहम होती है।

राजनीति में मूर्तियों का अहम योगदान है, मूर्तियों द्वारा वोट बैंक को भी देखा जाता है, भारत मे मूर्तियों के पीछे की राजनीति भी बहुत पुरानी है, नेताओं का मूर्ति प्रेम कभी भी यैसे ही नही उमडता। मूर्तियों के पीछे वोट बैंक भी एक वजह है और यह मूर्तियाँ प्रतीक बन जाती है।

सपा का ब्राम्हण प्रेम क्यो जगा:- यूपी में वोटों के लिहाज से करीब 11 प्रतिशत ब्राह्मणों ने जिस राजनीतिक दल के पक्ष में माहौल बनाया, वही सत्ता पर काबिज हुआ। वास्तव में ब्राह्मणों की ताकत सिर्फ 11 फीसदी वोट तक सीमित नहीं है। जानकारों के मुताबिक, ब्राह्मण राजनीतिक हवा बनाने में सक्षम हैं। लोकसभा चुनाव में ब्राह्मणों ने बीजेपी के लिए माहौल बनाया, तो यूपी में बीजेपी की लोकसभा सीटों की संख्या 10 से बढ़कर 71 पर पहुंच गई, ब्राह्मणों की संख्या भले ही 9 से 11 प्रतिशत हो। मगर यह प्रभावशाली वर्ग है, समाज में उसकी मान्यता है। यही वजह है कि ब्राह्मणों ने जिसका साथ दिया, उसकी चुनावों में बेहतर स्थिति होती है। ब्राह्मण सहभागी राजनीति का प्रतिनिधित्व करता है, यह किसी एक दल के साथ नहीं रहा। हालांकि वह फिलहाल निर्णायक भूमिका में नहीं, प्रतिकात्मकता भूमिका में है लेकिन फिर भी हर पार्टी में चर्चा का विषय जरूर है, और इसलिए भगवान परशुराम की मूर्ति लखनऊ में लगवाने की बात को उछाला गया।

मूर्तियों के शुद्दिकरण से भी वोट बैंक की पकड़

1- सन् 1979 में तत्कालीन उप प्रधानमंत्री जगजीवन राम ने बनारस में पूर्व मुख्यमंत्री संपूर्णानंद की मूर्ति का अनावरण किया था, बताते हैं कि कार्यक्रम के अगले दिन एक जाति विशेष के लोगों ने गंगाजल से मूर्ति धोई थी।

2- बनारस में ही साल 2014 में नामांकन पत्र दाखिल करने से पहले पीएम नरेंद्र मोदी ने मदन मोहन मालवीय की मूर्ति पर फूल चढ़ाया था, बाद में मूर्ति को समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने गंगाजल से धोया।

3- 14 अप्रैल 2018 को वडोदरा में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने डॉ. बीआर आंबेडकर की मूर्ति पर श्रद्धांजलि अर्पित की, इसके बाद दलित वर्ग के लोगों ने मूर्ति को दूध और पानी से धोकर शुद्ध किया।