हल्दीघाटी में नही खमनौर में महाराणा प्रताप और मुगलों के बीच लड़ा गया था युद्ध।।

चेतक को सभी जानते है पर क्या महाराणा प्रताप के हाथी का नाम जानते है आप, वह हाथी जो मुगलों के सामने 18 दिन तक नही झुका, तब अकबर ने उसकी शान में क्या कहा था। कौन थे गाड़िया लोहार, जिन्होंने ने अपमान और दुख की ज्वाला में जलते हुए महाराणा प्रताप के साथ प्रण किया था।।

ग्लोबल भारत न्यूज़ नेटवर्क

शख्सियत, 16 मई:- महाराणा प्रताप का नाम भारत के इतिहास में उनकी बहादुरी के कारण अमर है। वह अकेले राजपूत राजा थे जिन्होंने मुगल बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की, उनका जन्म 09 मई, 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ किले में हुआ था।

आइये पहले जानते है महाराणा प्रताप को फिर जानते है आगे की कहानी।

राजस्थान के कुंभलगढ़ में महाराणा प्रताप का जन्म महाराजा उदयसिंह एवं माता राणी जीवत कंवर के घर 09 मई, 1540 में हुआ था। महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था। महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक गोगुंदा में हुआ था। मेवाड़ की शौर्य-भूमि धन्य है जहां वीरता और दृढ प्रण वाले प्रताप का जन्म हुआ। जिन्होंने इतिहास में अपना नाम अजर-अमर कर दिया। उन्होंने धर्म एवं स्वाधीनता के लिए अपना बलिदान दिया।

हल्दीघाटी का युद्ध:- सन् 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में करीब बीस हजार राजपूतों को साथ लेकर महाराणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के अस्सी हजार की सेना का सामना किया। महाराणा प्रताप के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था, जिसका नाम ‘चेतक’ था। इस युद्ध में अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को शक्ति सिंह ने बचाया। यह युद्ध केवल एक दिन चला परंतु इसमें सत्रह हजार लोग मारे गए।

हल्दीघाटी में नही खमनौर में महाराणा प्रताप और मुगलों के बीच लड़ा गया था युद्ध:- मुगलों और महाराणा प्रताप के बीच का युद्ध हल्दीघाटी में नहीं हुआ था, हल्दीघाटी राजस्थान की दो पहाड़ियों के बीच एक पतली सी घाटी है, मिट्टी के हल्दी जैसे रंग के कारण इसे हल्दी घाटी कहा जाता है। इतिहास का ये युद्ध हल्दीघाटी के दर्रे से शुरू हुआ लेकिन महाराणा वहां नहीं लड़े थे, उनकी लड़ाई खमनौर में चली थी। मुगल इतिहासकार अबुल फजल ने इसे “खमनौर का युद्ध” कहा है।

राणा प्रताप के चारण कवि रामा सांदू ‘झूलणा महाराणा प्रताप सिंह जी रा’ में लिखते हैंः- महाराणा प्रताप अपने अश्वारोही दल के साथ हल्दीघाटी पहुंचे, परंतु भयंकर रक्तपात खमनौर में हुआ। बस चार घंटों में बदल गया सब क्योकि हल्दीघाटी के युद्ध की दो तारीखें मिलती हैं, पहली 18 जून और दूसरी 21 जून इन दोनों में कौन सी सही है, एकदम निश्चित कोई भी नहीं है, मगर सारे विवरणों में एक बात तय है कि ये युद्ध सिर्फ 4 घंटे चला था। 2006 में रिलीज हुई डायरेक्टर ज़ैक श्नाइडर की हॉलीवुड फिल्म है ‘300’ इतिहास के एक चर्चित युद्ध पर बनी इस फिल्म में राजा लियोनाइडस अपने 300 सैनिकों के साथ 1 लाख लोगों की फौज से लड़ता है, पतली सी जगह में दुश्मन एक-एक कर अंदर आता है और मारा जाता है। राणा प्रताप ने इसी तरह की योजना बनाई थी, मगर मुगलों की ओर से लड़ने आए जनरल मानसिंह घाटी के अंदर नहीं आए। मुगल जानते थे कि घाटी के अंदर इतनी बड़ी सेना ले जाना सही नहीं रहेगा। कुछ समय सब्र करने के बाद राणा की सेना खमनौर के मैदान में पहुंच गई, इसके बाद ज़बरदस्त नरसंहार हुआ। कह सकते हैं कि 4 घंटों में 400 साल का इतिहास तय हो गया।

चेतक को तो सभी जानते है क्या आप महाराणा प्रताप के हाथी रामप्रसाद को जानते थे:- महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के बारे में तो सुना ही होगा लेकिन उनका एक हाथी भी था जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। उदयपुर के टाइगर हिल स्थित प्रताप गौरव केंद्र में महाराणा प्रताप और उनके प्रिय हाथी की प्रतिमा लगाई गई है जो उनका प्रेम बयां करती है। रामप्रसाद हाथी का उल्लेख अल बदायूंनी ने जो मुगलों की ओर से हल्दीघाटी के युद्ध में लड़ा था ने अपने एक ग्रन्थ में किया है। वो लिखता है कि जब महाराणा पर अकबर ने चढ़ाई की थी तब उसने दो चीजों को बंदी बनाने की मांग की थी एक तो खुद महाराणा और दूसरा उनका हाथी रामप्रसाद। आगे अल बदायुनी लिखता है की वो हाथी इतना समझदार व ताकतवर था की उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही अकबर के 13 हाथियों को मार गिराया था।

चक्रव्यूह रचा गया था रामप्रसाद को पकड़ने के लिए:- उस हाथी को पकड़ने के लिए 7 बड़े हाथियों का एक चक्रव्यूह बनाया और उन पर 14 महावतो को बिठाया तब कहीं जाकर उसे बंदी बना पाये। एक भारतीय जानवर की स्वामी भक्ति। जब उस हाथी को अकबर के समक्ष पेश किया गया जहा अकबर ने उसका नाम पीरप्रसाद रखा। तब उस रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने और पानी दिया। पर उस स्वामिभक्त हाथी ने 18 दिन तक मुगलों का न तो दाना खाया और न ही पानी पिया और वो शहीद हो गया। तब अकबर ने कहा था कि जिसके हाथी को मैं अपने सामने नहीं झुका पाया उस महाराणा प्रताप को क्या झुका पाउँगा।

अब जानिए गड़िया लोहार कौन थे और क्या प्रण किया था उन्होंने महाराणा प्रताप के साथ।

गाड़िया लोहार वो थे जिनका अर्थ होता है गाड़ी में घर, वो कहलाते हैं गाड़िया लोहार। बैलगाड़ी इनका घर है और लोहारी इनका पेशा, इसीलिए इनको ‘गाड़िया लोहार’ के नाम से जाना जाता है। इतिहास प्रसिद्ध गाड़िया लोहार महाराणा प्रताप की सेना के साथ कंधे से कंधे मिलाकर चले थे। प्रताप की सेना के लिए घोड़ों की नाल, तलवार और अन्य हथियार बनाते थे।

राणा प्रताप के साथ किया था प्रण:- मेवाड़ में महाराणा प्रताप ने जब मुगलों से लोहा लिया और मेवाड़ मुगलों के कब्जे में आ गया, महाराणा की सेना में शामिल गाड़िया लोहारों ने प्रण लिया कि जब तक मेवाड़ मुगलों से आजाद नहीं हो जाता और महाराणा गद्दी पर नहीं बैठते, तब तक हम कहीं भी अपना घर नहीं बनाएंगे और अपनी मातृभूमि पर नहीं लौटेंगे। तब से आज तक अपने प्रण का पालन करते हुए गाड़िया लोहार चितौड़ दुर्ग पर नहीं चढ़े हैं। मेवाड़ भी आजाद हो गया और देश भी, लेकिन ये गाड़िया लोहार आज भी अपने उसी प्रण पर अडिग होकर न तो अपनी मातृभूमि पर लौटे और न ही अपने घर बनाए। घुमक्कड़ जिन्दगी जीने वाले गाड़िया लोहार ने प्रतापगढ़ (राजस्थान) शहर में ही नहीं, जिले में कई गांव-कस्बों भी अपना डेरा जमा रखा है, यहां सड़क के किनारे इनकी अस्थायी बस्ती बसी हुई है। मिट्टी के पांच-छह फीट ऊंचे कच्चे मकान, दो-चार मवेशी, एक बैल गाड़ी और कुछ लोहा-लक्कड़ यही इनकी संपत्ति है, सर्दी हो या गर्मी या फिर बारिश, यहीं पर इनका डेरा रहता है। शादी-ब्याह हो या कोई पर्व-त्यौहार सब कुछ यहीं सम्पन्न होता है।

लोहे के औजार बना कर करते है अपना जीवन यापन:- लोहे के औजार बनाकर जो कुछ मिलता है, उससे अपना और परिवार का पेट पालते हैं, इनके परिवार की महिलाएं पुरुष से अधिक मेहनती होती हैं। भयंकर गर्मी के दिनों में भी लोहा कूटने का कठोर श्रम करती हैं, और जब जी चाहा ये अपनी बैलगाड़ी लेकर दूसरे ठिकाने पर चल देते हैं। ये लोग कृषि उपकरणों के साथ रसोई में काम आने वाले छोटे-मोटे औजार भी बनाते हैं, परिवार का गुजर बसर करने के लिए ये लोग कड़ी मेहनत करते हैं। पुरुषों के साथ साथ महिलाएं भी अपना पसीना बहाने में पीछे नहीं रहती है, लोहे को कूट-कूट कर उनको औजार का रूप देना और बाजार में बेचना, यही इनकी आजीविका का साधन है।

यह भारत के इतिहास के वो पन्ने है जो कभी-कभी ही खुलते है:- गाड़िया लोहार इतिहास का वह बंद पन्ना है जो शायद ही कभी खुलता हो। यदि कभी खुलता भी है तो राजकीय-समारोहों में या सत्ता प्रतिष्ठानों में नहीं बल्कि लोकमानस की स्मृतियों की लोक-गंगा में। ये कथाएँ हैं जो इतिहास की महाकथाओं के साथ उपकथाओं में अंतर्धाराओं की तरह बहती रहती हैं जो इतिहास बनाती जरूर हैं पर जिन्हें इतिहास से परे सरका दिया जाता है क्योंकि ये सिर्फ लोग केवल देना जानते हैं, लेना या माँगना नहीं।

समय बदला पर ये नही बदले:- समय बदला पर ये नहीं बदले। न देह से, न आत्मा से। मानवीय लालसाओं का संक्षिप्त रूप है इनकी गाड़ी और इनकी चलती-फिरती गृहस्थी। आजीविका के लिए ये लोहे के सामान – चिमटा, हंसिया, खुरपी, कुल्हाड़ी, करछली आदि बनाकर घर-घर बेचते हैं। एक जमाने में जब बाजार का चरित्र इतना बाजारू नहीं हुआ था और जब भूमंडलीकरण की काली आँधी का बहना शुरू नहीं हुआ था तब तक इन गड़िया लोहारों को अपने इस पुश्तैनी रोजगार से चना-चबेना मिल जाता था पर पिछले कई दशकों से लोहे पर चोट करने वाले और जिंदगी की सुविधाओं को अँगूठा दिखाने वाले इस समुदाय को स्वयं चोटों का सामना करना पड़ रहा है। घर के सारे सदस्य लोहा पीटने में लगे रहते हैं पर आज के मशीनी युग में इनके हाथों के बनाए चिमटे, खुरपी बड़ी-बड़ी कंपनियों के बनाए सस्ते एवं चमचमाते उत्पादों के सामने दम तोड़ने लगे हैं।

एकलव्य के वंशज आज भी जब बाण चलाते हैं तो अँगूठे का इस्तेमाल नहीं करते:- गुमला (झारखंड) के सघन आदिवासी अंचलों में एक जनजाति जो स्वयं को जनजाति भी नहीं, प्रीमिटिव यानी आदिम-जनजाति बताते है। कहते हैं कि वे ‘एकलव्य’ के वंशज हैं और अब भी वे जब बाण चलाते हैं तो अँगूठे का इस्तेमाल नहीं करते हैं कि एक बार जो दे दिया, सो दे दिया। उसी अंचल में एक और आदिवासी जनजाति से रहती है, उनकी महिलाएँ अपने चेहरे पर तीन गुदना अवश्य गुदवाती हैं, दो गालों पर और एक माथे पर बिंदी की जगह। कहते हैं कि कभी इनके पूर्वज तीन युद्ध हार गए थे, इसी की ग्लानि और पीड़ा लिए वे आज भी घूमते हैं।

निष्ठा, समर्पण या देशप्रेम जैसा कुछ बचा है तो इन्हीं जंगलों में रहने वाले या खानाबदोस के बीच:- बहरहाल, भौतिक समृद्धि की ओर तेज रफ्तार से भागते बाजारवाद के इस युग में यदि कुछ बचा है- निष्ठा, समर्पण या देशप्रेम जैसा कुछ तो इन्हीं जंगलों में रहने वाले या खानाबदोस जीवन जीने वाले लोगों के बीच जिन्हें हम पिछड़ा या जंगली कहते हैं। हम तो इतने सभ्य हुए कि उनकी किसी भी भावना का मान रखना तो दूर, उलटे इनके जंगल, जानवर और पहाड़ों तक पर अपनी गिद्ध दृष्टि जमाए हुए हैं और जब भी मौका मिले उन्हें हड़प लेने को तैयार बैठे हैं।।

प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी गाड़िया लोहार के प्रण तुड़वाने में रहे थे नाकाम:- भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने गाड़िया लोहार का प्रण तुड़वाने के लिए एक अभियान शुरू किया था, तब कुछ गाड़िया लोहार ने चितौड़ में अपने घर बसाए थे, लेकिन अधिकांश अपने प्रण पर आज भी कायम हैं। सरकार ने भी इन्हें बसाने की कई योजनाएं बनाईं, लेकिन पूरी तरह कारगर साबित नहीं हुई।।