शख्सियत- स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा- बाल गंगाधर तिलक।।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय इन्होंने ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा’ का नारा दिया।

ग्लोबल भारत न्यूज़ नेटवर्क

शख्सियत, 06 जून:- भारत की स्वतंत्रता के लिए हमारे देश में बहुत से शूरवीरों ने जन्म लिया उनमें से आज एक नाम है, बाल गंगाधर तिलक का जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखी। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करके माँ भारती की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों और कठोर यातनाओं से न घबराने वाले वीरो के नाम अविस्मरणीय है।

स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा:- स्वराज को जन्मसिद्ध अधिकार बताने वाले क्रांतिकारी बाल गंगाधर ने ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखी थी, तिलक का व्यक्तित्व गागर में सागर की तरह था। भारतीय राष्ट्रवादी, शिक्षक, समाज सुधारक, वकील और पत्रकार होने के साथ-साथ वे ऐसे स्वतन्त्रता सेनानी थे जिन्होंने मां भारती की सेवा में अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया।

महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के एक गांव चिखली में हुआ था जन्म:- बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के एक गांव चिखली में हुआ था, तिलक उस पहली भारतीय पीढ़ी में थे जिन्हें आधुनिक कॉलेज शिक्षा पाने का मौका मिला। पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने खुद अध्यापन कार्य किया और कुछ समय तक स्कूल, कॉलेजों में गणित पढ़ाया। बताया जाता है कि वे गणित में इतने होशियार थे कि वे अपनी कक्षा से तीन कक्षा आगे के सवाल चुटकियों में हल कर देते थे, वे अंग्रेजी शिक्षा के घोर आलोचक थे और मानते थे कि भारतीय सभ्यता के प्रति यह भाषा अनादर सिखाती है।

भारतीय स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजी शासन के खिलाफ बोलने पर कई बार गए जेल:- बाल गंगाधर तिलक को ब्रिटिश, “भारतीय अशान्ति का पिता” कहकर पुकारते थे। तिलक कई बार आजादी की लड़ाई में ब्रिटिश सरकार के सामने रोड़ा बनकर खड़े हुए, अपने समाचार पत्र ‘मराठा दर्पण’ और ‘केसरी’ में उन्होंने खुलकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लिखा और जिसके चलते उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। 1908 में तिलक ने क्रान्तिकारी ‘प्रफुल्ल चाकी’ और ‘खुदीराम बोस’ के बम हमले का समर्थन किया जिसकी वजह से उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) स्थित मांडले की जेल भेज दिया गया। यहीं रहकर उन्होंने ‘गीता रहस्य’ पुस्तक की रचना की।

राजद्रोह का आरोप और पत्र केसरी में देश का दुर्भाग्य का लेख:- लोकमान्य तिलक ने अपने पत्र केसरी में “देश का दुर्भाग्य” नामक शीर्षक से लेख लिखा जिसमें ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध किया। उनको भारतीय दंड संहिता की धारा 124-A के अन्तर्गत राजद्रोह के अभियोग में 27 जुलाई 1897 को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें 6 वर्ष के कठोर कारावास के अंतर्गत माण्डले (बर्मा) जेल में बन्द कर दिया गया। भारतीय दंड संहिता में धारा 124-A ब्रिटिश सरकार ने 1870 में जोड़ा था जिसके अंतर्गत “भारत में विधि द्वारा स्थापित ब्रिटिश सरकार के प्रति विरोध की भावना भड़काने वाले व्यक्ति को 3 साल की कैद से लेकर आजीवन देश निकाला तक की सजा दिए जाने का प्रावधान था। 1898 में ब्रिटिश सरकार ने धारा 124-A में संशोधन किया और दंड संहिता में नई धारा 153-A जोड़ी जिसके अंतर्गत “अगर कोई व्यक्ति सरकार की मानहानि करता है यह विभिन्न वर्गों में नफरत फैलाता है या अंग्रेजों के विरुद्ध घृणा का प्रचार करता है तो यह भी अपराध होगा।

6 वर्ष का माण्डले में कारावास:- ब्रिटिश सरकार ने लोकमान्य तिलक को 6 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई, इस दौरान कारावास में लोकमान्य तिलक ने कुछ किताबो की मांग की लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उन्हे ऐसे किसी पत्र को लिखने पर रोक लगवा दी थी जिसमे राजनैतिक गतिविधियां हो। लोकमान्य तिलक ने कारावास में एक किताब भी लिखी, कारावास पूर्ण होने के कुछ समय पूर्व ही बाल गंगाधर तिलक की पत्नी का स्वर्गवास हो गया, इस ढुखद खबर की जानकारी उन्हे जेल में एक ख़त से प्राप्त हुई, और लोकमान्य तिलक को इस बात का बेहद अफसोस था की वे अपनी मृतक पत्नी के अंतिम दर्शन भी नहीं कर सके।

हिंदू परंपरओं में दखल नहीं था पसंद:- वैसे तो लोकमान्य तिलक खुद भी कम उम्र में शादी करे जाने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन उन्हें हिंदू रीतियों और मान्यताओं के साथ छेड़छाड बिल्कुल पसंद नहीं थी। उन्होंने एज ऑफ़ कंसेन्ट विधेयक 1891 का विरोध किया, जिसमें विवाह करने की न्यूनतम आयु को 10 से बढ़ाकर 12 वर्ष कर दिया था, यही वजह है कि इन्हें ‘हिन्दू राष्ट्रवाद का पिता’ भी कहा जाता है। लेकिन नये सुधारों को निर्णायक दिशा देने से पहले ही 1 अगस्त 1920ई. को बम्बई में उनकी मृत्यु हो गयी। मरणोपरान्त श्रद्धाञ्जलि देते हुए गांधी जी ने उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा और जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय क्रान्ति का जनक बतलाया।

जब गांधी जी को लेना पड़ा उनके नाम का सहारा:- 1919 ई. में कांग्रेस की अमृतसर बैठक में हिस्सा लेने के बाद उनका रुख थोड़ा नरम हो चला था। स्वास्थ्य भी खराब रहने लगा था और आखिरकार मुंबई में उनकी मृत्यु हो गई लेकिन वे लोगों के दिलों में अपनी छाप छोड़ गए, उनकी शख्सियत ऐसी थी कि गांधी जी को आंदोलन चलाने के लिए जब पैसे की कमी महसूस हुई तो उनके नाम का ही सहारा लेना पड़ा। गांधी जी ने उनकी मौत के एक साल बाद ही उनकी बरसी पर ‘तिलक स्वराज फंड’ की स्थापना की और आंदोलन चलाने के लिए 1 करोड़ रुपए की रकम जुटा ली, उस समय इतनी बड़ी रकम अकेले गांधी के लिए भी जुटा पाना लगभग असंभव था।।