आधुनिक समाज में मानवीय मूल्यों का अवमूल्यन।

आज भारत राष्ट्र ही नहीं, संपूर्ण विश्व मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन का शिकार हो गया है। मानव व्यक्तिगत स्वार्थों के वशीभूत होकर अपने काम को साधने के चक्कर में दानव बन गया है। (परशुराम उपाध्याय 'सुमन', वरिष्ठ पत्रकार)

*मानवीय मूल्यों का* *अवमूल्यन*

प्रतापगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार परशुराम उपाध्याय सुमन की कलम से ____

* *आज* भारत राष्ट्र ही नहीं, संपूर्ण विश्व मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन का शिकार हो गया है। मानवता कहीं-कहीं देखने को मिलती है। मानव व्यक्तिगत स्वार्थों के वशीभूत होकर अपने काम को साधने के चक्कर में पड़ा हुआ है।
*अपना काम बनता, भाड़* *में जाए जनता*
की होड़ लगी हुई है।
हम साहित्यमनीषी मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियां____
*वही* *मनुष्य है कि जो* *मनुष्य के लिए मरे*
संपूर्ण वातावरण में विलीन सा होता दिखाई पड़ रहा है। किसी मानव को दूसरे मानव के प्रति चिंता नहीं रह गई है, वह अपने में मस्त दिखाई पड़ रहा है।
हम मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन को निम्न शीर्षकों से उद्धृत करने का प्रयास कर रहे हैं___

*शिक्षा क्षेत्र*

पहले ही विद्यालयों को शिक्षा क्षेत्र का बहुत ही पवित्र स्थल माना जाता रहा है। विद्या का महत्व इतना था कि
*सा* *विद्या या विमुक्तए* एवं *विद्या ददाति विनयम*
का भाव सर्वत्र देखने को मिलता था। अध्यापक अपने दायित्व का बखूबी निर्वहन करते हुए बच्चों के भविष्य को बनाने के प्रयास में सदैव तत्पर रहता था और संस्कारवान शिक्षा प्रदान कर बच्चों को आदर्शों का जीवन जीने की शिक्षा प्रदान करता था, किंतु आज अध्यापक को बच्चों की चिंता न होकर अपने को सम्पन्न बनाने व परिवार के भविष्य की चिंता सताए हुए है। बल्कि यूं कह लीजिए कि आज की शिक्षा अर्थ प्रधान हो गई है। धन कमाने के पीछे अध्यापक भी अपने कर्तव्य से विचलित हो चुका है। *आज की विद्या* *अर्थकरी हो गई है।*
पढ़े लिखे लोग भी अपने पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्र के प्रति कर्तव्य को भूल कर दिन दूना रात चौगुना कमाने के चक्कर में अंधे हो चुके हैं।
स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, रामकृष्ण परमहंस जैसे परम संतों का जमाना बहुत पीछे छूट गया है।

*सामाजिक क्षेत्र*
पहले समाज में एक दूसरे के प्रति प्रेम, विश्वास और लगाव था लोग एक दूसरे का सम्मान करते थे चाचा, चाची, बाबा, आजी, दादा दादी, भैया दाऊ कहकर लोगों को संबोधित करने जैसे प्रचलन, समाज को एकता एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण में बांधे रखते थे, किंतु आज समय बदल चुका है । हर मनुष्य अपने स्वार्थ को प्राथमिकता देते हुए दूसरे की चिंता नहीं कर रहा है एक दूसरे के सहयोग पर भी विराम लग चुका है। मानो समाज की ओर से आने वाली प्रतिक्रिया की तनिक भी चिन्ता न करते हुए अपकृत्य करने में संकोच नहीं कर रहा है। न किसी को समाज का डर है और न ही कानून का। गांव में सामूहिक तौर से एक दूसरे के सहयोग से किए जाने वाले तमाम सामाजिक कार्यक्रमों का समापन हो चुका है।

*आर्थिक क्षेत्र*
आर्थिक क्षेत्र में भी काफी गिरावट देखने को मिल रही है। संपूर्ण समाज आचरणहीन दिखने लगा है। उन्हें इस सूक्ति भी ख्याल नहीं है कि –

“If wealth is lost, nothing is lost,
If health is lost, something is lost,
If character is lost, everything is lost.”

की कहावत को ताख पर रखकर लोग एन केन प्रकारेण
*पैसा* *गुरु और सब चेला*
को प्राथमिकता देते हुए लोग अहर्निश जुटे दिख रहे हैं, चाहे वह कितनी भी अनधिकृत और की कमाई हो।
लोग भूल गए हैं कि_
*अभिवादन शीलस्य नित्य* *वृद्धोपि सेविन:*
*चत्वारि तस्य वर्धन्ते* *आयुर्विद्या यशो बलम्*
वर्तमान युग में मानव के दिमाग से यह भी उतर गया है कि_
*अन्यायोपार्जितं वितं दशम* *वर्षाणि तिष्ठति,*
*प्राप्ते तु एकादशे बर्षे समूलं* *विनश्यति।*
धर्म के माध्यम से अर्थ कमाने का भाव ही सबके दिलो-दिमाग से निकल चुका है।

*पारिवारिक क्षेत्र*
आज का मानव, पारिवारिक कलह से जूझ रहा है। भाई भाई के प्रति स्नेह, माता पिता के प्रति सम्मान, सास बहू का रिश्ता, पति पत्नी के बीच का अटूट समर्पित संबंध अदृश्य होता दिखाई पड़ रहा है।
साहित्य शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा श्री रामचरितमानस में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के आचरण का उल्लेख करते हुए सार्थक चौपाई_
*प्रात काल उठिके रघुनाथा।*
*मात पिता गुरु नावहिं* *माथा* ।*
बच्चों को सिर्फ कहानी का बोध करा रही है। बच्चों की प्रथम पाठशाला घर में भी महिलाएं, बच्चों को ज्ञानोपयोगी व संस्कारिक प्राथमिक शिक्षा न देकर आधुनिक युग की शिक्षा की ओर मुखातिब हैं। उनको भी बड़े होकर अच्छा पैसा कमाने की शिक्षा दी जा रही है।
लोगों का खान-पान इतना बिगड़ चुका है कि उन्हें बफर सिस्टम जैसे तरीकों से एक दूसरे का जूठन खाने में जरा भी संकोच नहीं हो रहा है। आम चर्चा है कि समाज के ऐसे सिस्टम भयंकर बीमारियों को जन्म देते हैं, जिसका पूरा समाज आज भुक्तभोगी हो चुका है। समाज की इन कुरीतियों पर अंकुश लगाये जाने की तात्कालिक आवश्यकता है।

*धार्मिक क्षेत्र*
पहले गांव में एक दूसरे के सहयोग से धार्मिक कार्यक्रमों, भजन कीर्तन आदि की समुचित व्यवस्था देखने को मिलती थी और विश्व कल्याण के लिए सामूहिक यज्ञ हवन आदि कराए जाते थे, आज तो लोगों के दिमाग में सिर्फ और सिर्फ अर्थ कमाने का धंधा स्थान ले चुका है। बड़ी-बड़ी कथाएं, धर्म के नाम पर लूटने का अड्डा बन चुकी हैं। यह कहने में संकोच नहीं कि ज्यादातर कथावाचक अपनी जेबें भरने में विश्वास रखने लगे हैं। उनकी निगाहें, अंतिम दिन बंटने और वापस होने वाले लिफाफों की मोटाई पर टिकी होती हैं। आज यदि समाज के सहयोग से दुर्गा पूजा व गणेश पूजा आदि कोई भी धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होता है, तो उनमें भी आयोजक मंडल के लोगों में ईमानदारी का भाव नहीं रहता। आयोजकों में चंदे से एकत्रित हुए धन से कुछ खाने-पीने और अपव्यय करने में संकोच का भाव नहीं दिखता। आज का मानव पूरी तरह से संवेदनहीन हो गया है।संवेदनहीनता का वातावरण सर्वत्र दिख रहा है।

*राजनीतिक क्षेत्र*
जनता के द्वारा जनता की भलाई के लिए निर्वाचित जनसेवकों में भलाई कम, अपनी तिजोरी भरने का भाव आ चुका है। विकास के कार्यों में भी कहां से कितना अधिकतम कमीशन मिलेगा, इसका सदैव ध्यान रहता है।
निर्वाचित जनसेवक भी अपने समर्थकों को प्राथमिकता देते हुए अन्य की भलाई को ताक पर रखकर अपनों की भलाई पर ध्यान आकर्षित करते रहते हैं। समझ में तो यही आ रहा है कि
वर्तमान समय में मानवता का पतन (अवमूल्यन) ज्यादातर अर्थो प्राप्ति के प्रति ऊहापोह या प्राप्ति की कुचेष्ठा के कारण हुआ है।
मानवीय मूल्यों का अवमूल्य इस सीमा तक पहुंच चुका है कि लगता है कि इसमें सुधार होने में युग बीत जाएगा।
इस महत्वपूर्ण बिंदु पर विद्वानों को चिंतन करना होगा, अन्यथा राष्टृ के पतन की कोई सीमा नहीं होगी।