सदियों में कोई एक सरदार बन पाता है, और वो एक सरदार सदियों तक अलख जगाता है।।

कुछ ऐसा था वल्लभ भाई पटेल के सरदार बनने का सफर, जानिए 31 अक्टूबर को क्यो मनाया जाता है राष्ट्रीय एकता दिवस।।

ग्लोबल भारत न्यूज़ नेटवर्क

शख्सियत, 31 अक्टूबर:- वल्लभभाई पटेल एक ऐसा नाम जो जब भी किसी बुजुर्ग जिसने स्वतंत्रता आन्दोलन को प्रत्यक्ष रूप से देखा था, जब उनका नाम ज़हन में आता हैं तब शरीर नव उर्जा से भर जाता हैं, लेकिन मन में एक आत्म ग्लानि सी उमड़ पड़ती हैं, क्यूंकि उस वक्त का हर एक युवा वल्लभभाई को ही प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता था, लेकिन अंग्रेजो की नीति, महात्मा गांधीजी के निर्णय एव जवाहरलाल नेहरु के हठ के कारण यह सपना सच न हो सका। वल्लभभाई पटेल एक कृषक परिवार से थे, जिसमे चार बेटे थे। एक साधारण मनुष्य की तरह इनके जीवन के भी कुछ लक्ष्य थे, यह पढ़ना चाहते थे, कुछ कमाना चाहते थे और उस कमाई का कुछ हिस्सा जमा करके इंग्लैंड जाकर अपनी पढाई पूरी करना चाहते थे। इन सबमे इन्हें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा, पैसे की कमी, घर की जिम्मेदारी इन सभी के बीच वे धीरे-धीरे अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते रहे। शुरुवाती दिनों में इन्हें घर के लोग नाकारा समझते थे, उन्हें लगता था ये कुछ नहीं कर सकते। इन्होने 22 वर्ष की उम्र में मैंट्रिक की पढाई पूरी की और कई सालों तक घरवालो से दूर रहकर अपनी वकालत की पढाई की, जिसके लिए उन्हें उधार किताबे लेनी पड़ती थी। इस दौरान इन्होने नौकरी भी की और परिवार का पालन भी किया। एक साधारण मनुष्य की तरह ही यह जिन्दगी से लड़ते- लड़ते आगे बढ़ते रहे, इस बात से बेखबर कि ये देश के लौह पुरुष कहलाने वाले हैं।

पहला और बड़ा योगदान 1918 में खेड़ा संघर्ष में था:- सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में हुआ था। लंदन जाकर उन्होंने बैरिस्टर की पढ़ाई की और वापस आकर अहमदाबाद में वकालत करने लगे थे। इस दौरान आजादी की लड़ाई जोर पकड़ रही तो पटेल भी महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में कुद पड़े। स्वतंत्रता आंदोलन में सरदार पटेल का पहला और बड़ा योगदान 1918 में खेड़ा संघर्ष में था। उन्होंने 1928 में हुए बारदोली सत्याग्रह में किसान आंदोलन का सफल नेतृत्त्व भी किया। वर्ष 1947 में भारत को आजादी तो मिली लेकिन बिखरी हुई। देश में कुल 562 रियासतें थीं। अपनी कूटनीतिक क्षमता के बल पर पटेल ने इन्हें भारत में मिला लिया। इनमें जूनागढ़ रियासत के नवाब ने 1947 में पाकिस्तान के साथ जाने का फ़ैसला किया था। इसके बाद पटेल ने जूनागढ़ रियासत का भारत में विलय करा लिया। सरदार पटेल 12 नवंबर, 1947 को जूनागढ़ पहुंचे। उन्होंने भारतीय सेना को इस क्षेत्र में स्थिरता बहाल करने के निर्देश दिए थे।

सरदार वल्लभ भाई पटेल के जीवन के कुछ रोचक तथ्य।

01- लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल भारत के पहले उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री थे।

02- स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देशी रियासतों का एकीकरण कर अखंड भारत के निर्माण में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। उन्होंने 562 छोटी-बड़ी रियासतों का भारतीय संघ में मिलाकर एक भारत राष्ट्र का निर्माण कराया।

03- आजकल जिस उम्र में बच्चे गेजुएट हो जाते हैं उस उम्र में सरदार बल्लभ भाई पटेल ने 10वीं की परीक्षा पास की थी। उनकी शिक्षा में सबसे ज्यादा रोड़े परिवार की आर्थिक तंगी ने अटकाए। इसके बावजूद उन्होंने ज़िलाधिकारी की परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त किए।

लौहपुरूष की ऐसी छवि ना देखी, ना सोची कभी। आवाज में सिंह की दहाड़ थी, ह्रदय में कोमलता की पुकार थी।

एकता का व रूप जो रचा। देश का मानचित्र पल भर में बदला, गरीबो का सरदार था वो। दुश्मनों के लिए तलवार था वो।

आंधी की तरह बहता गया, ज्वालामुखी सा धधकता गया। बनकर गांधी का अहिंसा का शस्त्र, महकता गया विश्व में जैसे कोई ब्रह्मस्त्र

04- कोर्ट में बहस चल रही थी। सरदार पटेल अपने मुवक्किल के लिए जिरह कर रहे थे, तभी एक व्यक्ति ने कागज़ में लिखकर उन्हें संदेश देता है। संदेश पढ़कर पटेल उस कागज को अपनी कोट की जेब में रख लेते हैं। उन्होंने जिरह जारी रखी और मुक़दमा जीत गए। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि उस कागज पर उनकी पत्नी झावेर बा की मृत्यु की खबर थी। जब अदालती कार्यवाही समाप्त हुई तब उन्होंने अपनी पत्नी की मृत्यु की सूचना सबको दी।

05- यह किस्सा सन 1928 का है, जब भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान गुजरात में एक अहम किसान आंदोलन हुआ था। जिसका नेतृत्व वल्लभभाई पटेल ने किया था। ब्रिटिश सरकार ने गुजरात में किसानों पर 22 से 30 प्रतिशत का लगान लेने का फैसला किया था या यूं कह लें कि उनपर थोप दिया था। वल्लभभाई पटेल ने इसी के खिलाफ आंदोलन किया था। इस इतिहास में बारदोली सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है।

06- ब्रिटिश सरकार ने गुजरात के किसानों से तीस प्रतिशत तक लगान लेने की बहुत कोशिश की, लेकिन वो सफल नहीं हो पाए। वल्लभभाई पटेल ने लगान में हुई बढ़ोतरी का पुरजोर विरोध किया। बारदोली में पटेल ने किसानों को साथ लेकर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। गुजरात में उस वक्त अकाल का दौर चल रहा था, इसके बाद भी वल्लभभाई पटेल को किसानों का पूरा सहयोग मिला।

07- क्रॉस-जांच और ग्राम प्रतिनिधियों से बात करने के बाद, आंदोलन में होने वाली कठिनाई पर विचार के बाद वल्लभभाई पटेल ने लगान के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत की। ब्रिटिश सरकार ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए कठोर कदम उठाए, किसानों पर अतयाचार किए, उनके घर तबाह कर दिए लेकिन लोगों ने हिम्मत नहीं हारी। आखिर में विवश होकर किसानों की मांगों के सामने झुकना ही पड़ा।

08- ब्रिटिश सरकार के न्यायिक अधिकारी ब्लूमफील्ड और एक राजस्व अधिकारी मैक्सवेल ने संपूर्ण मामलों की जांच कर 22 से 30 प्रतिशत लगान वृद्धि को गलत ठहराते हुए इसे घटाकर 6.03 प्रतिशत कर दिया।

09- इस सत्याग्रह आंदोलन के सफल होने के बाद वहां की महिलाओं ने वल्लभभाई पटेल को ”सरदार” की उपाधि प्रदान की। इसी के बाद से वल्लभभाई पटेल को सरदार पटेल के नाम से भी जाना गया।

10- राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने बारदोली आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा था, इस तरह के किसान संघर्ष और आंदोलन हमें स्वराज के करीब पहुंचा रही है और हम सब हिन्दुस्तानियों को स्वराज की मंजिल तक पहुंचाने में ये संघर्ष सहायक होंगे।

31 अक्टूबर को क्यो मनाया जाता है राष्ट्रीय एकता दिवस:- सरदार वल्लभ भाई ने 565 रियासतों का विलय कर भारत को एक राष्ट्र बनाया था। यही कारण है कि वल्लभ भाई पटेल की जयंती के मौके पर राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है। पहली बार राष्ट्रीय एकता दिवस 2014 में मनाया गया था, बता दें कि भारत का जो नक्शा ब्रिटिश शासन में खींचा गया था, उसकी 40 प्रतिशत भूमि इन देशी रियासतों के पास थी। आजादी के बाद इन रियासतों को भारत या पाकिस्तान में विलय या फिर स्वतंत्र रहने का विकल्प दिया गया था। सरदार पटेल ने अपनी दूरदर्शिता, चतुराई और डिप्लोमेसी की बदौलत इन रियासतों का भारत में विलय करवाया था। इसलिए भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती को मनाने के लिए भारत सरकार द्वारा साल 2014 में 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस की शुरुआत की गई थी।।