इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ट्रांसजेंडर और समलैंगिक जोड़ों के लिव-इन को मिली सुरक्षा, पुलिस को सुरक्षा देने के निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: प्यार और आजादी पर कोई पाबंदी नहीं!पुलिस ऑसिफिकेशन टेस्ट (Ossification Test) जैसी कानूनी प्रक्रिया अपना सकती है।
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि दो बालिग व्यक्ति, चाहे वे ट्रांसजेंडर हों या समलैंगिक, अपनी मर्जी से लिव-इन रिलेशनशिप में रहना चाहते हैं, तो परिवार या समाज को उनके जीवन में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला मुरादाबाद जिले के मझोला थाना क्षेत्र का है। याचिकाकर्ताओं (एक ट्रांसजेंडर और उनके साथी) ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बताया कि वे दोनों बालिग हैं और स्वेच्छा से साथ रह रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके परिजनों से ही उनकी जान-माल को खतरा है। स्थानीय पुलिस से सुरक्षा की गुहार लगाने के बाद भी जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तब उन्होंने न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों को सर्वोपरि बताया। कोर्ट की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
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- जीवनसाथी चुनने का अधिकार: किसी भी बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का पूर्ण अधिकार है।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला: कोर्ट ने नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ (2018) मामले का जिक्र किया, जिसके तहत समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी (धारा 377) से बाहर किया गया था।
- अकांक्षा बनाम यूपी राज्य (2025) का संदर्भ: कोर्ट ने कहा कि शादी न होने या न कर पाने की स्थिति में भी व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार सुरक्षित रहते हैं।
”एक बार जब कोई बालिग व्यक्ति अपना जीवन साथी चुन लेता है, तो परिवार या किसी अन्य को उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा डालने का कोई अधिकार नहीं है। राज्य का कर्तव्य है कि वह हर नागरिक की स्वतंत्रता की रक्षा करे।” — इलाहाबाद हाईकोर्ट
पुलिस को सख्त आदेश
हाईकोर्ट ने पुलिस प्रशासन को निर्देशित किया है कि:
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- यदि याचिकाकर्ताओं के शांतिपूर्ण जीवन में कोई बाधा आती है, तो संबंधित पुलिस कमिश्नर या एसएसपी उन्हें तत्काल सुरक्षा प्रदान करें।
- उम्र के सत्यापन के लिए यदि दस्तावेजी सबूत न हों, तो पुलिस ऑसिफिकेशन टेस्ट (Ossification Test) जैसी कानूनी प्रक्रिया अपना सकती है।
- यदि कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है, तो पुलिस इन जोड़ों के खिलाफ कोई जबरन कार्रवाई नहीं करेगी।
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ग्लोबल भारत न्यूज़ डिजिटल डेस्क




