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पासपोर्ट पर भ्रम खत्म

नीरस बहस नहीं, ठोस फैसला — घुसपैठियों के लिए अल्टीमेटम, देश के लिए नया स्पष्टीकरण।

पासपोर्ट पर भ्रम खत्म

डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर
स्वतंत्र पत्रकार

नीरस बहस नहीं, ठोस फैसला — घुसपैठियों के लिए अल्टीमेटम, देश के लिए नया स्पष्टीकरण।

देश का संवैधानिक और कानूनी आधार साफ होना देशहित में है। 24 जून को 14वें “पासपोर्ट सेवा दिवस” पर विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा दिये गये स्पष्ट शब्द — “भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, यह केवल यात्रा दस्तावेज है” — युक्तिसंगत, कानूनी और आवश्यक हैं। यह निर्णय न तो नया कानून है, न ही अचानक बनी नीति; यह तो वही पुराना कानून और न्यायिक दृष्टि जनता के सामने रख देना है, जिसे समय से छुपाया गया या सुविधानुसार तिरोहित कर दिया गया था। और यही सहजता इसे अनुच्छेद 370 हटाने जैसे बड़े राजनीतिक कदम से भी व्यापक बनाती है: एक राज्य की विशेष स्थिति खत्म करने से अलग, यह फैसला पूरे देश में बैठे उन लाखों अवैध व वाकई-नागरिकों के प्रश्नचिह्न पर असर डालता है।

सबसे पहले तथ्य स्पष्ट कर दूँ : पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 20 में स्पष्ट प्रावधान है कि केन्द्र सरकार आवश्यकता पड़ने पर गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है। यानी कानून हमेशा मानता रहा है कि पासपोर्ट और नागरिकता अलग-अलग अवधारणा हैं। 2013 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी इसी बात को न्यायिक रूप से स्थापित किया। सवाल यह नहीं कि सरकार ने नयी समझ दी, बल्कि यह है कि अब सरकार ने वही कानूनी सच्चाई सार्वजनिक कर दी और उसकी सीमाओं को स्पष्ट कर दिया — और यही पारदर्शिता लोकतंत्र के लिए अच्छी खबर है।

विरोधियों की परवाह के बिना सच बोलना कठिन होता है, पर जरूरी भी। जो लोग चिल्ला रहे हैं कि यह कदम “असली भारतीयों” को निशाना बनाएगा, उन्हें ठोस तर्क से जवाब दिया जाना चाहिए। भारतीय नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत होता है — जन्म स्थान, जन्म तिथि, माता-पिता की नागरिकता, जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल के रिकॉर्ड, जमीन के कागजात और सरकारी रिकॉर्डों की एक परम्परागत श्रृंखला से। अधिकतर सच्चे नागरिकों के पास यही इतिहास और दस्तावेजों की सततता होती है; वही नागरिकता की वैधता साबित करते हैं। दूसरी ओर अवैध प्रवासी — जिनके पास नकली आधार, नकली वोटर कार्ड और बनावटी दस्तावेज होते हैं — उनका प्रमाणिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं रहता। पासपोर्ट दिखाने का जो समतुल्य तर्क विरोधी उठाते हैं, वह इसलिए खोखला है क्योंकि पासपोर्ट कभी-कभी बिना नागरिकता की गारण्टी के भी दिया जाता रहा है; पासपोर्ट रद होने पर भी नागरिकता स्वतः समाप्त नहीं हो जाती — यह नैतिक और कानूनी भेद स्पष्ट करता है।

राजनीतिक प्रासंगिकता भी स्पष्ट है। दशकों से कुछ पार्टियाँ ठोस प्रमाणीकरण (वेरिफिकेशन) के बिना न केवल प्रवासियों को सहारा देती रहीं, बल्कि उन्हें वोट बैंक में बदलने की रणनीति अपनाती रहीं। जब देश के कानून और रिकॉर्ड की विश्वसनीयता चुनौतियों में होगी, तो लोकतंत्र की निर्णय-प्रक्रिया पर असर पड़ेगा। अब यदि सरकार पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण नहीं मानती, तो वही राजनीतिक चक्र टूटने की ओर बढ़ेगा जो बिना दस्तावेज़ीय सत्यापन के चुनावी लाभ उठाता आया है। यही वजह है कि विरोधी गुटों की बेचैनी इतनी तेज दिखाई दे रही है — क्योंकि इस एक स्पष्टीकरण से उनके कई ऐतिहासिक दाँव-पर-दाँव टिक नहीं रहेंगे।

व्यापक सामाजिक व कानूनी निहितार्थ भी हैं। यह कदम सख्ती का कट्टर रूप नहीं, बल्कि पहचान के मानकीकरण की दिशा में पहला आवश्यक चरण है। नागरिकता के प्रमाण की प्रक्रिया में पारदर्शिता और दस्तावेज़ीय सत्यापन का महत्व बढ़ेगा। इसके चलते प्रशासनिक प्रणालियों — एनपीआर, स्मार्ट बॉर्डर्स, जनगणना — के साथ तालमेल बैठाकर वास्तविकता पर आधारित नीति बनायी जा सकेगी। असली प्रश्न यह है कि कैसे देश अवैध प्रवास नियंत्रित करे, पश्चात् उनकी तय प्रक्रिया के माध्यम से मानवाधिकार और संवैधानिक सुरक्षा भी सुनिश्चित करे। कड़े कदम उठाने की बजाय, सटीक पहचान, दस्तावेज़ों की वैरिफिकेशन, और कानूनी प्रक्रिया—यही सन्तुलित रास्ता होना चाहिए।

विरोधियों को दिये जाने योग्य सख्त, लेकिन युक्तिसंगत जवाब भी साफ होने चाहिए : पहला, पासपोर्ट किसी का नागरिकता का प्रमाण नहीं है — यह क़ानून और उच्च न्यायालय की स्थिति है। दूसरा, यदि किसी के पास नागरिकता साबित करने के पर्याप्त दस्तावेज़ हैं तो उन्हें डरने की जरूरत नहीं। तीसरा, जो लोग वोट बैंक की राजनीति कर रहे थे, वे अब जवाब दें कि क्या वे एक सुरक्षित और सार्वभौमिक पहचान प्रणाली के विरुद्ध हैं या अवैध प्रवास की नीति के समर्थन में? चौथा, मानवाधिकार और संवैधानिक प्रक्रियाओं का ख्याल रखते हुए ही नियम लागू होंगे — इसलिए आरोप-प्रत्यारोप के बजाय विरोधियों को पारदर्शिता और वैधता की बात स्वीकार करनी चाहिए।

निहितार्थ यह भी है कि यह कदम आत्मसमीक्षा का आमंत्रण है — सरकार और विपक्ष दोनों के लिए। सरकार को यह भरोसा देना होगा कि सत्यापन मानवीय तरीके से और यथोचित समय में होगा; विपक्ष को चाहिए कि वह ध्वनि-राजनीति की जगह तर्क और वैकल्पिक नीति प्रस्ताव रखे। यदि हम संवैधानिक व्यवस्था, कानून और नागरिक सुरक्षा को प्राथमिकता दें, तो यह स्पष्टिकरण देश को सशक्त बनाएगा, केवल किसी एक दल के नहीं बल्कि पूरे गणतंत्र के हित में।

निष्कर्षत: यह निर्णय किसी भी तरह की “शॉर्टकट” नीतियों का संकेत नहीं है; यह केवल एक बीज है—कानून के अनुरूप पहचान की साफ-सुथरी परिभाषा का बीज। जो लोग इसे घोर अभियान या चुनिन्दा निशाना बताकर शोर मचाएँगे, उन्हें याद रखना चाहिए :- देश का हित, कागज़ों की सत्यता और संविधान का आदर बड़े बयानबाज़ी से कहीं ऊपर है। और जब देश के कानूनी वास्तविकताओं को बिना जुमलों के सामने रखा जाए, तो वही लोकतंत्र की जीत होती है।
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DrShakti KumarPandey

डा० शक्ति कुमार पाण्डेय अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रहे हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स और यूएनआई के पत्रकार रहे हैं। आजकल 'ग्लोबल भारत' मासिक पत्रिका और न्यूज पोर्टल के प्रधान सम्पादक हैं।

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