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यू.जी.सी. विधेयक के विरोध में अधिवक्ताओं का प्रदर्शन, राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग

कुंडा बार एसोसिएशन ने विधेयक को शिक्षा व्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताते हुए सौंपा ज्ञापन, आंदोलन तेज करने की चेतावनी

ग्लोबल भारत न्यूज से अभिषेक पाण्डेय

बार एसोसिएशन के नेतृत्व में हुए इस विरोध कार्यक्रम में अधिवक्ताओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यू.जी.सी. विधेयक लागू होने की स्थिति में उच्च शिक्षा का ढांचा पूरी तरह चरमरा जाएगा और शिक्षा आम जनता की पहुंच से बाहर हो जाएगी। अधिवक्ताओं का आरोप है कि यह विधेयक शिक्षा को केंद्रीकृत करने के साथ-साथ संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों पर भी सीधा प्रहार करता है।

प्रदर्शन का नेतृत्व बार एसोसिएशन अध्यक्ष एडवोकेट बी.पी. मौर्य ने किया। इस दौरान महामंत्री योगेश कुमार त्रिपाठी (योगी जी), संयुक्त मंत्री मन्दीप कुमार त्रिपाठी सहित बड़ी संख्या में अधिवक्ता मौजूद रहे। अधिवक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि यह विधेयक न केवल विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को समाप्त करेगा, बल्कि शिक्षा में समानता और अवसर की भावना को भी खत्म कर देगा।

विरोध सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि यू.जी.सी. विधेयक के माध्यम से शिक्षा व्यवस्था को एक खास ढांचे में बांधने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे समाज में विभाजन की स्थिति पैदा होगी। अधिवक्ताओं ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध बताते हुए कहा कि किसी भी कानून का उद्देश्य जनहित होना चाहिए, न कि समाज को कमजोर करना।

इस अवसर पर प्रमुख रूप से दिवाकर नाथ पांडे, प्रदीप कुमार पाण्डेय, बृजेंद्र मणि त्रिपाठी, शैलेंद्र कुमार, नागेंद्र श्रीवास्तव, दिनेश बहादुर सिंह, भूपेंद्र, पूर्व महामंत्री दयाशंकर मिश्र, पंकज शुक्ला, आशीष यादव, राहुल केसरवानी, हरिओम उपाध्याय, संदीप त्रिपाठी सहित कई वरिष्ठ और युवा अधिवक्ताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

अधिवक्ताओं ने ज्ञापन के माध्यम से राष्ट्रपति महोदय से मांग की कि जनहित को ध्यान में रखते हुए यू.जी.सी. विधेयक को तत्काल वापस लिया जाए। उन्होंने कहा कि यदि सरकार ने इस विधेयक पर पुनर्विचार नहीं किया, तो अधिवक्ता समाज आंदोलन को और अधिक व्यापक व उग्र रूप देने के लिए बाध्य होगा।

बार एसोसिएशन ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि शिक्षा और संविधान से कोई भी समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अधिवक्ताओं ने कहा कि लोकतंत्र में आवाज उठाना उनका संवैधानिक अधिकार है और वे अंतिम सांस तक शिक्षा, न्याय और संविधान की रक्षा के लिए संघर्ष करते रहेंगे।

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