ज्ञान का केंद्र कम व्यवसाय के अड्डे बनते जा रहें है निजी स्कूल
क्या सिस्टम की धार हो चुकी है कुंद, शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अधिकारों में कटौती का सतह पर दिखने लगा असर

ज्ञान का केंद्र कम व्यवसाय के अड्डे बनते जा रहें है निजी स्कूल
कक्षा 1 के बच्चे के बैग का बजट पंहुचा हजारों के पार, नित नए स्वांग के पैसे अलग माध्यम
क्या सिस्टम की धार हो चुकी है कुंद, शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अधिकारों में कटौती का सतह पर दिखने लगा असर
ग्लोबल भारत डेस्क: बच्चों की प्राथमिक शिक्षा के नाम पर खुली दुकानें सब ज्ञान का केंद्र बनने की जगह व्यवसाय का अड्डा बनते जा रहे हैं। जिंदगी की जंग मर्द व्यस्त अभिभावकों को समय ही नहीं रहता कि वो जांच सके कि उनके नौनिहालों को क्या पढ़ाया जा रहा है। उनके मासूम कंधों पर कितना बोझ लाता जा रहा है इसकी जांच तो बड़े बड़े शिक्षित और शिक्षक गण स्वयं भी नहीं कर पाते कि किस आयु वर्ग में बच्चे पर औसत भार होना चाहिए।
चकाचौंध में डूबे अभिभावक को शायद ही यह ध्यान बचा हो कि उनके बच्चों को शिक्षा के नाम पर कहीं भार वाहक तो बना जा रहा है, इस संदर्भ में हमने बात किया प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डॉ राजीव त्रिपाठी से तो उन्होंने बताया कि 1 से लेकर 5वीं कक्षा के बच्चों के बस्ते में न्यूनतम बोझ होना चाहिए लेकिन हो उसके उलट रहा है। बच्चों पर पढ़ाई के बोझ के मुख्य कारण और *प्रभाव अत्यधिक प्रतिस्पर्धा* स्कूल और पेरेंट्स की तरफ से हमेशा ‘टॉप’ करने का दबाव बच्चों को मशीन बना रहा है, जिससे उनकी रचनात्मकता (Creativity) खत्म हो रही है।स्कूल बैग का बोझ: भारी बस्ते बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य (पीठ दर्द, थकान) के लिए हानिकारक हैं।मानसिक तनाव (Stress): हर समय परीक्षा का डर और पढ़ाई के दबाव के कारण बच्चे छोटी उम्र में ही तनाव और अवसाद (Depression) का शिकार हो रहे हैं।बचपन की कमी: अतिरिक्त क्लासेस (Tuition) और होमवर्क के कारण बच्चों को खेलने और आराम करने का समय नहीं मिल पाता।अभिभावकों की उच्च उम्मीदें: माता-पिता भूल जाते हैं कि हर बच्चे की प्रतिभा अलग होती है और उन पर डॉक्टर, इंजीनियर बनने का दबाव डालते हैं।बोज कम करने के उपाय:शिक्षण को रोचक बनाएं: शिक्षा को रटने की बजाय खेल-खेल में सीखने (Play-way method) का माध्यम बनाएं।
बच्चों की क्षमता समझें हर बच्चे की क्षमता और रुचियां अलग होती हैं, उनके अनुसार उन्हें आगे बढ़ने दें। खेल और गतिविधियों को महत्व पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद और अन्य रचनात्मक गतिविधियों के लिए भी समय निकालें।दबाव न डालें: बच्चों से अत्यधिक उम्मीदें न रखें, उन्हें सिर्फ अपना सर्वश्रेष्ठ करने के लिए प्रोत्साहित करें, न कि हमेशा प्रथम आने के लिए।पढ़ाई का तरीका बदलें: लंबे समय तक पढ़ने के बजाय छोटे-छोटे सेशन्स (जैसे 30-60 मिनट) में पढ़ाई करें।

