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विदेश फण्डिंग पर पारदर्शिता की दीवार!

विदेशी धन से चलने वाले किसी भी संस्थान, अभियान, शोध-परियोजना, धार्मिक-सामाजिक गतिविधि या जनमत-निर्माण तंत्र के पीछे एक बुनियादी प्रश्न होना चाहिए— पैसा कहाँ से आया, किस उद्देश्य से आया, किसके हाथों में गया और भारत की सामाजिक-राजनीतिक दिशा पर उसका प्रभाव क्या पड़ा?

विदेश फण्डिंग पर पारदर्शिता की दीवार!

डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर
स्वतंत्र पत्रकार

विदेशी धन से चलने वाले किसी भी संस्थान, अभियान, शोध-परियोजना, धार्मिक-सामाजिक गतिविधि या जनमत-निर्माण तंत्र के पीछे एक बुनियादी प्रश्न होना चाहिए— पैसा कहाँ से आया, किस उद्देश्य से आया, किसके हाथों में गया और भारत की सामाजिक-राजनीतिक दिशा पर उसका प्रभाव क्या पड़ा?

भारत में विदेशी धन के सवाल को केवल दान, सेवा या विकास की भाषा में नहीं समझा जा सकता। यह सवाल उतना ही राजनीतिक है जितना आर्थिक, उतना ही सामाजिक है जितना राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ।

इसी कसौटी पर एफसीआरए—विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम—का महत्व समझना होगा। सरकार का प्रस्तावित ‘फॉरेन कण्ट्रीब्यूशन (रेगुलेशन ) अमेण्डमेण्ट बिल, 2026’ अभी संसद की प्रक्रिया में है, जबकि “एफसीआरए संशोधन नियम, 2026”, 22 जून 2026 से लागू हैं। इन्हें किसी संगठन-विशेष, धर्म-विशेष या विचार-विशेष के विरुद्ध अभियान कहना तथ्य से अधिक राजनीतिक आरोप होगा। इसका मूल उद्देश्य विदेशी धन के प्रवेश से लेकर उसके अन्तिम उपयोग तक जवाबदेही और पता-योग्यता स्थापित करना है।

असली प्रश्न : दान या प्रभाव? :

भारत विदेशी सहयोग का विरोधी नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत, वैज्ञानिक अनुसन्धान, पर्यावरण, ग्रामीण विकास और सामाजिक कल्याण जैसे क्षेत्रों में वैध विदेशी सहयोग का स्थान है। स्वयं सरकार के अनुसार 2024-25 में लगभग 16,200 सक्रिय एफसीआरए-पञ्जीकृत संस्थाओं को करीब ₹22,963 करोड़ का विदेशी अंशदान मिला। यह आँकड़ा बताता है कि एफसीआरए विदेशी सहायता पर प्रतिबन्ध नहीं, बल्कि उसे नियमों और सार्वजनिक जवाबदेही के भीतर रखने की व्यवस्था है।
लेकिन हर विदेशी धन को निष्कलंक मान लेना भी राजनीतिक भोलेपन की पराकाष्ठा होगी। दुनिया भर में विदेशी वित्तपोषण के माध्यम से जनमत, चुनावी विमर्श, नीति-निर्माण, मीडिया-नैरेटिव, धार्मिक प्रभाव और सामाजिक ध्रुवीकरण को प्रभावित करने की आशंका पर कानून बनाये गये हैं। अमेरिका का एफसीआरए, ऑस्ट्रेलिया की ‘फॉरेन इन्फेलुन्स ट्रांसपेरेंसी स्कीम’ , ब्रिटेन की ‘फॉरेन इन्फेलुन्स रजिस्ट्रेशन स्कीम’ और कनाडा का नया पारदर्शिता कानून इसी वैश्विक चिन्ता की उपज हैं। भारत का एफसीआरए कोई असाधारण या अलोकतांत्रिक विचलन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सम्प्रभुता की रक्षा हेतु विश्वव्यापी प्रवृत्ति का भारतीय रूप है।

यहाँ मुद्दा यह नहीं कि किसी संस्था ने विदेश से धन लिया या नहीं। मुद्दा यह है कि क्या उस धन का उद्देश्य पारदर्शी है; क्या वह घोषित गतिविधि पर खर्च हुआ; क्या उसके पीछे भारत के लोकतांत्रिक, सामाजिक और संवैधानिक ढाँचे को प्रभावित करने की कोई अपारदर्शी रणनीति तो नहीं।

2026 के नियम क्या बदलते हैं? :

नये नियमों ने विदेशी फण्डिंग को अधिक स्पष्ट, सीमित और सत्यापनीय बनाने की दिशा में कई निर्णायक कदम उठाये हैं।
अब संस्थाओं को एफसीआरए आवेदन में केवल व्यापक श्रेणियाँ—शैक्षिक, सामाजिक, धार्मिक या सांस्कृतिक—लिखकर काम नहीं चलेगा। उन्हें स्वीकृत गतिविधियों की सूची में से अपना सटीक उद्देश्य चुनना होगा और यह भी बताना होगा कि वे किन राज्यों या केन्द्रशासित प्रदेशों में काम करेंगी। गतिविधि या कार्यक्षेत्र बदलने पर फिर अनुमति लेनी पड़ेगी।

संस्था को अपने सोशल मीडिया अकाउण्ट, वेबसाइट, पिछले वर्षों की गतिविधियों और खर्च का विवरण भी देना होगा। यह व्यवस्था विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज वैचारिक प्रभाव केवल सभाओं और पर्चों से नहीं, डिजिटल प्लेटफॉर्मों, वीडियो, लक्षित प्रचार और संगठित ऑनलाइन अभियानों के माध्यम से भी बनाया जाता है।
नवीनीकरण के लिए पिछले दो वित्तीय वर्षों में कम-से-कम ₹10 लाख विदेशी अंशदान का उपयोग दिखाना होगा। इसका घोषित उद्देश्य निष्क्रिय संस्थाओं को केवल लाइसेंस संभालकर रखने से रोकना है।

“की फंक्शनरी” अर्थात संस्था के वास्तविक सञ्चालन, निर्णय और वित्तीय नियंत्रण से जुड़े निदेशक, ट्रस्टी, कर्ता, पदाधिकारी और प्रबन्धन-समिति सदस्य अधिक स्पष्ट जवाबदेही के दायरे में आएँगे।

विदेशी स्रोत से आया धन किस अन्तिम विदेशी दाता से उत्पन्न हुआ, यह बताना होगा—भले वह किसी मध्यस्थ संस्था के जरिये पहुँचा हो। यही प्रावधान धन के स्रोत को परतों में छिपाने की सम्भावना घटाता है।

यहाँ से एक सन्देश साफ निकलता है :- भारत में कोई भी संगठन समाज-सेवा करे, विचार रखे, धर्म-सम्बन्धी कार्य करे या शोध करे—लेकिन विदेशी धन के सहारे अपारदर्शी समानान्तर सत्ता-तंत्र नहीं चला सकता।

प्रस्तावित कानून की बड़ी धार :

2026 का प्रस्तावित संशोधन विधेयक एक और महत्वपूर्ण कमी को भरना चाहता है। वर्तमान व्यवस्था में एफसीआरए पञ्जीकरण रद्द, समाप्त या सरेण्डर होने पर विदेशी अंशदान से बनी सम्पत्तियों के प्रबन्धन का प्रश्न व्यावहारिक कठिनाई पैदा करता रहा है। प्रस्तावित कानून में एक “डिजिगटेड अथॉरिटी” का प्रावधान है, जो ऐसी सम्पत्तियों का अस्थायी प्रबन्धन कर सकेगी।
इसे लेकर “सरकार सब कुछ छीन लेगी” जैसे नारे उछाले गये हैं। तथ्यों में यह दावा टिकता नहीं। प्रस्तावित ढाँचे में केवल विदेशी अंशदान से निर्मित सम्पत्तियाँ दायरे में आती हैं; संस्था की हर निजी या घरेलू सम्पत्ति नहीं। पञ्जीकरण बहाल होने की स्थिति में धन और सम्पत्तियाँ लौटाने की व्यवस्था प्रस्तावित है। आदेश के विरुद्ध पुनरीक्षण और जिला न्यायाधीश के समक्ष अपील का अधिकार भी रखा गया है।

हाँ, इस कानून पर गम्भीर विधायी बहस आवश्यक है। ‘पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च’ ने उचित प्रश्न उठाया है कि नियमों के जरिये गतिविधियों की सूची, भौगोलिक सीमाएँ और “उचित गतिविधि” की परिभाषा तय करना कहीं मूल अधिनियम की सीमा से आगे तो नहीं जाता। यह आपत्ति लोकतांत्रिक विमर्श का वैध हिस्सा है। मजबूत कानून वही होता है जो राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करे, पर न्यायिक समीक्षा, अनुपातिकता और वैध नागरिक कार्यों की स्वतंत्रता भी बचाये।
जनसांख्यिकी के नाम पर तथ्यहीनता नहीं :

विदेशी धन, धार्मिक प्रचार और जनसांख्यिकीय बदलाव के प्रश्न संवेदनशील हैं। इन्हें न तो उपहास में उड़ाया जाना चाहिए, न उत्तेजक अपुष्ट दावों से भड़काया जाना चाहिए। किसी समुदाय के विरुद्ध सामूहिक सन्देह, किसी संस्था पर बिना प्रमाण आरोप, या हर सामाजिक गतिविधि को “राष्ट्र-विरोध” घोषित करना न कानून है, न राष्ट्रहित। सही रास्ता यह है कि धन का स्रोत, प्राप्तकर्ता, घोषित उद्देश्य, वास्तविक गतिविधि, खर्च का रिकॉर्ड और कानून-उल्लंघन—हर बिन्दु प्रमाण के साथ जाँचा जाए। यदि कोई संस्था विदेशी धन का उपयोग अवैध धर्मान्तरण, हिंसा, अलगाववाद, चुनावी हस्तक्षेप, सामाजिक वैमनस्य या भारत-विरोधी गतिविधियों में करती है, तो कार्रवाई कठोर, त्वरित और निष्पक्ष होनी चाहिए। लेकिन यदि कोई अस्पताल, स्कूल, राहत संगठन या शोध संस्था कानूनसम्मत ढंग से काम कर रही है, तो उसे केवल विदेशी दान लेने के कारण अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।

निष्कर्ष :

एफसीआरए की शक्ति किसी “चमत्कारी राजनीतिक हथियार” में नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शिता में है। नकेल का अर्थ वैध सेवा-कार्य को कुचलना नहीं; नकेल का अर्थ है विदेशी धन के पीछे छिपे उद्देश्य, नेटवर्क और प्रभाव को सार्वजनिक जवाबदेही के घेरे में लाना। जो संस्थाएँ ईमानदारी से काम करती हैं, उनके लिए साफ लेखा-जोखा सुरक्षा-कवच है। जो संस्थाएँ विदेशी धन की परतों के पीछे राजनीतिक प्रभाव, वैचारिक दबाव, धार्मिक प्रलोभन, अवैध हस्तक्षेप या सामाजिक तनाव की खेती करना चाहती हैं, उनके लिए यह व्यवस्था चेतावनी है। भारत को न तो विदेशी सहयोग से डरना चाहिए, न विदेशी प्रभाव की सम्भावना के प्रति आँखें मूँदनी चाहिए। लोकतंत्र की ताकत शोर में नहीं—स्रोत, तथ्य, कानून और जवाबदेही में है।
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DrShakti KumarPandey

डा० शक्ति कुमार पाण्डेय अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रहे हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स और यूएनआई के पत्रकार रहे हैं। आजकल 'ग्लोबल भारत' मासिक पत्रिका और न्यूज पोर्टल के प्रधान सम्पादक हैं।

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